Bhoot wali kahani

Bhoot wali kahani 

(Bhoot ki kahani, Bhutiya kahani)

अगर आप bhoot wali kahani या Bhutiya kahani पढ़ने के शौक़ीन है या आपको bhoot ki kahani पढ़ने में मजा आता है तो सही जगह पे आये है. इस ब्लॉग पे हमने काफी रोमांचक और डरावनी bhoot ki kahani का कलेक्शन किया हुआ है. हम आप से आग्रह करते है की कृपया बच्चों को इस bhutiya kahani यों से दूर रखे, उन्हें bhoot wali kahani ना पढ़ने दिया जाये। जैसे हमें bhutiya kahani पढ़ने का शौक है वैसे ही अगर आप को यह bhoot wali kahani पसंद आए तो इसे अपने दोस्तों में शेअर जरूर करें ताकी हमारा हौसला बढ़ा रहें और हम आप के लिए ऐसे ही मजेदार और डरावनी नई bhoot ki kahani पोस्ट कर सके, धन्यवाद्।


Bhoot wali kahani-1

ख़ौफ़

      - 8 मिनट की Bhoot ki Kahani

 शाम ढल रही थी | आसमान पुरा काला पड चुका था जैसे किसी ने काले रंग की शीशी उडेल दि हो | शायद बारिश आने को बेकरार है | घिरा हुआ आसमान और ठंडी हवाये चाँदनी को बेहद पसंद थी | बारिश चाँदनी के बदन में एक अजब सी सिहरन पैदा करती थी | चाँदनी आईने के सामने पिछले आधे घंटे से बन-सवर रही थी | बन-सवर क्या ? सजने की रिहर्सल कर रही थी | तीन बार तो साडीयाँ चेन्ज कर चुकी थी | चाँदनी को साज-श्रुंगार का बहुत शौक था आज उसे मिसीस कपूर की बेटी की शादी में जाना था | चाँदनी कॉलेज की अध्यापक थी मगर दिखती कॉलेज स्टुडन्ट जैसी ! वो हमेशा खूबसूरत दिखना और खूबसूरत रहना चाहती थी | चाँदनी अब तैयार होकर रवाना हि हो रही थी उसके नजर अखबार पर पड़ी | उसमें कोई भैरव चौक की खबर थी | लिखा था की भैरव चौक नाम के एक छोटे से इलाके में बहुत सारी अजीबो-गरीब घटनाएं घटी है | कितनी वारदातें हुई है लूट-मार, हत्या, अपहरण, बलात्कार, भूत-प्रेत का साया, सभी घटनाएं वही तो घटी है लोग वहाँ दिन के उजाले में भी जाने का साहस नहीं करते थे | ये खबर पढते ही थोडे समय पहले चाँदनी का चमकता चहेरा फिका पड गया उसके चहरे पर मानो हलका खौफ मंडरा रहा हो ! थोडी देर वो खामोश होकर वही खडी रही मानो ये खबर उसके मन में घर कर गई हो ! चाँदनी की खामोशी मिसीस कपूर के फोन ने तोडी | चाँदनी ने फोन उठाया और बातें करते वहाँ से कार में निकल गई | चाँदनी को शादी में पहुँचने में कोई दिक्कत नहीं आई | चाँदनी ने गाडी से बाहर निकलने से पहले एक बार फिर अपना चेहरा निखार लिया था | चाँदनी का स्वागत हँसते चहेरो ने किया | मगर कुछ चहेरे ऐसे भी थे जिसने चाँदनी को बुरी नियत से देखा | वो चहेरे थे कॉलेज के बदमाश और कॉलेज ट्रस्टी के बीगडे हुए लडके ! कॉलेज ऊन लडको को पाँच पापी बुलाती थी | लडकीयो को छेड़ना, लडकीयो के साथ बद-तमीजी करना, लड़ना-झघडना वो सब उन पांचो को काम था इसलिए कॉलेज उसे पाँच पापी बुलाती थी | खैर ! चाँदनी भी उनकी हरकतों को भलीभाती जानती थी इसलिए उसको अनदेखा करके शादी में शामिल हो गई | नाच-गाना, खाना-पीना, गप्पे लडाने और बिदाई में पता हि नहीं चला के ......
रात के 11 बज गये है | उसे घर पहुँचने में अभी उसे 2 घंटो का फासला तय करना था | चाँदनी के पति जतीन का फ़ोन आता था |
Bhoot wali kahani
Bhoot wali kahani
‘हेल्लो चाँदनी ? कहा हो ?’ – जतीन ने कहा |
‘में शादी में आई थी पर बहुत देर हो गई है बस मिसीस माथुर के साथ अब निकल ही रही हुं’
 – चाँदनी ने बातें खतम करके फोन रखा | चाँदनी ने फटाफट से मिसीस कपुर बाय किया और मिसीस माथुर को ढुंढने लगी मगर पता चला की मिसीस माथुर तो घर के लिए कब की रवाना हो चुकी है | चाँदनी सोचने लगती है की अब अकेली घर कैसे जायेगी ? तभी अचानक से तेज बिजली कडकी ...सायद थोडे समय के बाद बारिश होने वाली है उसने किसी परवा करे बिना वहाँ से अकेली निकल पड़ी मगर वो पाँच पापी चाँदनी की हर हरकत नजर रखे हुए थे | चाँदनी ने बस थोड़ा सा हि फासला तय किया हि था की बारिश की बुंदाबारी आने लगी |  चाँदनी मन हि मन सोच रही थी की वो बारिश बंद होने का इन्तजार करे ? या फीर आगे बढे ? चाँदनी को जल्द हि तय करना था उसे क्या करना है ? उसने आगे बढ़ने का फैसला किया | चाँदनी की कार थोडी आगे बढी ही थी की तेज बारिश शरु हो गई | हमेशा चाँदनी को सिहरन देने वाली बारिश की बुंदे आज बाधा बन रही थी | चाँदनी बारिश की बुंदोबारी को चीरती आगे बढ़ रही थी | चाँदनी का आगे बढ़ने का फैसला सही था क्योंकि बारिश बंद हो चुकी थी | चाँदनी हलके मन से ड्राईव कर रही थी मगर ...लगता है आज का दिन चाँदनी के लिए सच-मुच भारी था क्योंकि सामने ट्राफीक जाम था | गाडीयों की लम्बी लाईन लगी थी | किसी से पूछा तो पता चला की भारी बारिश के चलते आगे का रास्ता पुरा ब्लॉक हो चुका है | जब तक रास्ता साफ नहीं होगा तब तक ट्राफिक जाम रहेगा और रास्ता साफ होने में सुबह भी हो सकती है | सुबह का नाम सुनते हि चाँदनी की हवाईयाँ उड लगी | तभी चाँदनी देखती है की कुछ गाडीया कच्ची सड़क की तरफ़ जा रही है | ‘भैया ये कच्ची सड़क कहा जाती है ?’ – चाँदनी ने किसी से पुछा | ‘ये कच्ची सड़क शहर जाती है बहन जी’ चाँदनी फिर से सोचने लगी की वो रास्ता खुलने का इन्तजार करे या फिर कच्चे रास्ते से जाये ? उसने सोचा की वो कब तक अकेली रास्ता साफ होने का इन्तजार करेंगी ? वो भी कच्ची सड़क की तरफ़ जा रही गाडियां के साथ गाडी चला कर शहर वाले रास्ते जा सकती है इसलिए उसने वो कच्ची सड़क से घर जाने का फैसला किया | चाँदनी आगे बढ़ तो रही थी मगर खौफ़ अभी भी उसके सीर पर डर मंडरा रहा था क्योंकि वो आगे चल रही गाडियां के सहारे जा रही थी जैसे कोई दीपक की रोशनी लेकर अंधेरे से गुजर रहा हो ! आगे चल गाडीयो की रफ्तार तेज होती है वो सब चाँदनी की कार से आगे बढ़ जाती है | इतनी बढ जाती है की वो सब कारे हेडलाईट के सहारे देखी जा सकती थी | चाँदनी भी उन तक पहुंचने के लिए अपनी गाडी की स्पीड बढाती है मगर .... गाडी अचानक से बंद हो जाती है |

 गाडी बंद होते हि चाँदनी बदहवास सी हो जाती है | वो वहाँ अकेली थी आगे पीछे कोई नहीं था | आगे जाती गाडीयाँ एक के बाद एक आंखो से ओझल हो रही थी | चाँदनी अब बेचेन सी होने लगी थी | धडकने तेज चल रही थी | उसके माथे से डर की बुंदे एक के बाद टपकने लगी थी उसके आंखो में खौफ साफ़ दिख रहा था | वो गभराके जोर-जोर से सांसे ले रही थी | उसने अपने पर्स से फोन निकाला और जतीन का नंबर डायल करने लगी मगर वहाँ मोबाइल कनेशन के नाम पर कुछ नहीं था | वो इतना डर गई थी की वो गाडी से बाहर निकलना भी नहीं चाहती थी | उसे कुछ सूझ नहीं था बस गाडी स्टार्ट करने में लगी थी वो बार बार चाबी को डाए-बाए घुमा रही थी मगर नतिजा वही गाडी स्टार्ट नहीं हो रही थी | अचानक से चाँदनी की नजर उसके पर्स में जाती है और उसमें एक तवीज दिखता है वो तवीज जो चाँदनी की माँ ने आखरी सांस लेते वक्त दिया था और कहा था की 'ये तवीज बुरे वक्त में तुम्हारी हिफाजत करेगा' | चाँदनी ने तुरंत तवीज लिया और आँखें बंद करके फ़िर से गाडी स्टार्ट करने की कोशिश करने लगी | माँ का दिया तवीज काम कर गया था गाडी एक झटके में स्टार्ट हो गई थी | चाँदनी के तो जान में जान आई हो ऐसे राहत की सांस ली | चाँदनी तवीज की शक्ती से अचंभित हो गई | वह समय व्यर्थ किये बिना वहाँ से चल दी | चाँदनी एकादा किलोमीटर का रास्ता काटा था वहाँ उसे एक बोर्ड दिखता है उसे बोर्ड पे लिखा था .भैरव चौक .! भैरव चौक नाम पढते ही रौगटें खड़े हो गये और आँखें खुली की खुली रह गई उसकी सांसे फिर से तेज रफ्तार से बढ़ने लगी | वही भैरव चौक जिसके बारे चाँदनी्ने पढा था जहाँ पर खुन, बलात्कार जैसे वारदातें हुई थी | उसने फ़िर से तवीज को हाथ में थामा और एक पल के लिए आँखें बंद की जैसे वो भगवान से दुआ मांग रही हो के अब की बार गाडी बंद ना हो ! मगर . ये क्या ? चाँदनी की कार भैरव चौक के नाम के बोर्ड के ठिक सामने आ कर रुक गई | चाँदनी ने बाहर का नजारा देखा तो वो बेहद अँधेरा और डरावना था | जुगनु की टमटमाटी रोशनी के सीवाँ कुछ दिखाई नहीं दे रहा था | चाँदनी ने फिर से तवीज उठाया और आँखें बंद कर के भगवान का नाम लेती हुई गाडी स्टार्ट करने में जुट गई | गाडी के चाबी को डाई-बाई घुमाकर उसकी उंगलीया तक थक गई थी मगर अब की बार गाडी शुरू होने का नाम ही नहीं ले रही थी | एक दो बार फोन भी लगाया मगर वहाँ भी उसे नाकामीयबी मिली वो इतनी डरी हुई थी की गाडी से बाहर निकलने में भी उसके पैर कांप रहे थे | तभी ..उसे सामने कुछ दिखा .. सामने से सफेद रंग की कुछ धुंधली-धुंधली आकृति आ रही थी | चाँदनी उसे देख दहल गई और बदन में कंपकंपी होने लगी | वो आकृति जैसे-जैसे आगे आ रही थी वैसे-वैसे एक आकृति से तीन आकृतियाँ हो गई थी | काले घने अंधेरे में सफेद रंग साफ-साफ दिख रहा था | चाँदनी उसे देख बस सोच रही थी ये क्या आ रहा है ? सफेद चादर ओढे कोई आदमी ? या फ़िर कोई भूत-प्रेत.. ? चाँदनी के पसीने छुटने लगे थे | चाँदनी ने जल्दी से गाडी के शीशे बंद है की नही ये तसल्ली कर ली और वहाँ बैठे-बैठे तवीज को थामे आंखे बंद करके भगवान का नाम जपने लगी | अब वो आकृतियाँ चाँदनी के गाडी के आगे पीछे मंडराने लगी थी | सहमी हुई चाँदनी जोर-जोर सांसे लेकर, हलकी सी कनकियों से देख रही थी | तभी किसी ने गाडी के शीशे पर जोरदार वार किया |
चाँदनी उस तरफ देखा तो मालुम पडा के वो गाडी के शीशे तोडने की कोशीश कर रहे थे | चाँदनी गभराके जोर-जोर से चील्लाने लगी - ‘बचाओ , बचाओ !’ चाँदनी चिल्लाती रही और वो शीशे पर वार करते रहे और एक शीशा तोड़ दिया | शीशे टुटते ही चाँदनी को कही से मदद मिल जाये इसलिए वो जोर से चिल्लाने लगी - ‘बचाओ, कोई मुझे बचाओ !!’ किसी ने गाडी का दरवाजा खोल दिया और चाँदनी का हाथ पकद के गाडी से एक झटके में बाहर फ़ेक दिया | चाँदनी गाडी से बाहर गीरकर एक पत्थर से आ टकराई | चाँदनी मानो अधमरी सी हो गई थी उसने हिम्मत जुटाई और वहाँ से उठ खड़ी हो गई तो उसने देखा के वहाँ तीन सफेद चादर ओढे तीन शख्स थे | वो तीनो के चहरे काले, दहशतभरे और भयानक थे और सब हाथ में चक्कू लेकर खड़े थे | चाँदनी समझ गई के ये सब लुटेरे है और बिना कुछ बोलें चाँदनी ने सोने-चांदी के जेवर निकालने लगी | ‘ये सब ले लो मगर मुझे जाने दो’ – चाँदनी से बिलकते हुई उन लुटेरो से कहा | एक लुटेरे ने तुरंत चाँदनी के हाथों से सब जेवर छीन लिए | चाँदनी अभी भी बिकल-बिलक कर बस रोये जा रही थी | ‘ये सब तो हम लेंगे ही मगर इतनी लूट काफ़ी नहीं हमारे लिए’ – एक लूटेरे ने चाँदनी के उपर हवस भरी नजर डालते कहा | चाँदनी लूटेरो का इरादा समज गई थी और एक सांस लेकर वहाँ से भागी | वो तीनो भी चाँदनी के पीछे भागे | मगर सहमी हुई चाँदनी कितने तक भाग पाती ? उन तीनो भैडीये ने आखिरकार चाँदनी को पकद ही लिया | ‘बचाओ . बचाओ !’ – चाँदनी पुरी ताकत से चिल्लाई | ‘यहाँ तुम्हें बचानेवाले कोई नहीं आयेगा ! चिल्लाओ जीतना चिल्लाना हो ऊतना’ – एक लुटेरे ने हँसते हुए कहा | तभी एक लुटेरे पर पिछे से तेज वार होता है | वो लुटेरा वही ढेर हो जाता है | चाँदनी को एक आशा की किरण दिखाई देती है | वो दोनो लुटेरे पीछे देखते है की ये वार किसने किया ? चाँदनी भी उस तरफ देखती जहाँ से वार हुआ था | वहाँ वो कॉलेज के पांच स्टुडन्ट होते है जीसे कॉलेज पाँच पापी कहके बुलाती थी | वो पाँच स्टूडन्ट बचे दो लुटेरे पर झपते है उन्हे मार मारके बेहोश कर देते है | चाँदनी वहाँ सहमी खडी आंखो से आंसु बरसाती बस देखती रही थी और सोच रही थी की जिस पाँच पापी को बुरा और गलत समज रही थी वही लोगो ने आज चाँदनी को बुरे हादसे से बचा रहे थे | ‘मेडम हम बुरे है मगर इज्जत सब की करते है आप बेफ़िकर होकर जाईये | ये बंटी आप को सुरक्षित घर तक छोड़ देगा और हम इन लुटेरो को पुलिस के हवाले कर देगें इन लोगो ने भूत-प्रेत के नाम पर बहुत लूट मचा रखी थी अब पुलिस इन्हे मजा चखायेगी – एक स्टुडन्ट ने कहा | ‘मुझे माफ कर देना ! मै तुम लोग को गलत समज नहीं थी मगर तुम ....’ इन से आगे चाँदनी के मुँह से एक शब्द भी निकल नहीं पाये चाँदनी के आंसु ही थे जो सारी बातें बयां कर रहे थे | चाँदनी वहाँ से सुरक्षित होकर घर गई |

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Bhoot wali kahani-२

ब्रह्म-प्रेत 

7 मिनट की bhoot wali kahani 

भूत, प्रेत-पिशाच, चुड़ैल, डायन, डाकिनी आदि नाम हर व्यक्ति के लिए कौतुहल बने रहते हैं, रहस्यमय बने रहते हैं। आज के वैज्ञानिक युग में वैज्ञानिकता इनके अस्तित्व को सिरे से खारिज करती है पर बिना ठोस प्रमाण के और साथ ही कभी-कभी कुछ ऐसे अतार्किक तर्कों से प्रेत-अस्तित्व को झुठलाने की कोशिश की जाती है जो हास्यास्पद लगता है। कुछ लोग तो कहते हैं कि भूत-प्रेतों का कोई अस्तित्व ही नहीं है, ये तो बस मानव मन की काल्पनिक उपज है पर ये लोग भी मानते हैं कि मृत्यु के बाद आत्मा कहाँ जाती है, आत्मा क्या है आदि के गूढ़ प्रश्नों को विज्ञान भी नहीं समझ पाया है। इसके लिए पढ़े-लिखे लोग भी इतिहास के पन्नों में झाँकने लगते हैं। हर धर्म के धर्मग्रंथों में आपको कुछ ऐसे लोकों के बारे में, ऐसे प्राणियों के बारे में रहस्यमयता का भान हो ही जाता है जो कहीं न कहीं भूत-प्रेत आदि के विश्वास को पुख्ता कर जाता है। पारंपरिक रूप से देखा जाए तो इंसान जब से अस्तित्व में आया है तब से इसका पाला कुछ रहस्यमयी चीजों से पड़ा है, कुछ अमानवीय कार्यों ने, प्राणियों ने मानव-मन को झकझोरा है और उसे मानव दुनिया से बाहर निकलकर अमानवीय दुनिया में भी गोते लगाने, उसे समझने के लिए बाध्य किया है। दुनिया की रहस्यमयता को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता पर यह भी सत्य है कि बिना तर्क के इस रहस्यमतया को पूरी तरह से अलौकिक भी तो करार नहीं दिया जा सकता। खैर इंसान को बहुत सारी अनोखी, रहस्यमयी बातों, प्राणियों ने आश्चर्यजनक रूप से प्रभावित किया है, इसी के मद्देनजर आज मैं आप लोगों को कुछ व्यक्तियों द्वारा सुनाई एक कौतुहल, रहस्यमयी, भूतही घटना सुना ही देता हूँ। पर इस घटना का वर्णन मैं यहाँ विशेष रूप से मनोरंजन के लिए कर रहा हूँ और इसलिए घटना से संबंधित स्थानों आदि का नाम बदल देना ही उचित समझता हूँ। मैं भी विज्ञान का छात्र रहा हूँ पर विज्ञान-विज्ञान चिल्लाना ही ठीक नहीं है, विज्ञान को मानते हुए भी तो लोगों द्वारा बताई जाने वाली, कही जाने वाली घटनाओं पर विचार किया जा सकता है, उसे अपने तर्क की कसौटी पर कसा जा सकता है?
Bhoot wali kahani
Bhoot wali kahani

यह कहानी है आज से लगभग 70-80 साल पहले की। उस समय हमारे जिले-जवार के लोग विशेष रूप से गाँव में ही रहकर खेती-बारी के साथ ही पशुपालन आदि से अपने और अपने परिवार का जीवन-निर्वाह किया करते थे। इने-गिने लोग ही नौकरी की तलाश में बड़े-बड़े शहरों की ओर कूच करते थे या अत्यधिक पैसे की लालच में कुछ लोग मजदूर के रूप में अपने गाँव से दूर हो जाते थे। कुछ लोग कोलकता (तब कलकत्ता), मुंबई (तब मंबई) आदि भारतीय शहरों के साथ ही म्यानमार (वर्मा) आदि अन्य कई देशों में चले जाते थे और इनमें से कुछ तो बुढ़ापे आदि में अपने वतन को वापस आ जाते थे पर अधिकांश वहीं के बनकर रह जाते थे, वहीं मरखप जाते थे और अपने अस्तित्व को सदा के लिए दबा देते थे पर कुछ ऐसे भी होते थे जो अपनी मेहनत से मजदूर से मालिक बन जाते थे और मरने के बाद भी इनके आलिशान घरों में इनकी संतानें इनके माल्यार्पित रेखा-चित्रों, चित्रों आदि को नमन करते रहते थे।हमारे जवार के ही रमेसर बाबू को अपनी बाबूशाहत को दरकिनार करते हुए कोलकाता जाना पड़ा था। दरअसल हुआ यह था कि रमेसर बाबू के पिताजी अपने समय के जवार के नामी पियक्कड़ थे, गाँजा-भाँग आदि के बिना वे अपने जीवन को पूरी तरह से अपूर्ण मानते थे, पूरी तरह से शान-शौकत वाला जीवन जीते थे और इसी के चक्कर में उन्होंने अपने बाप-दादों की जमीन औने-पौने में बेंच दी थी, बिना इस बात की परवाह करते हुए कि उनकी अपनी एकमात्र संतान यानी रमेसर बाबू का क्या होगा? खैर पिताजी की अच्छाइयों का तो संतान पर प्रभाव पड़ता ही है, बुराइयाँ भी पीछा नहीं छोड़तीं। आखिरकार पिता के मरने के बाद रमेसर बाबू के पास फटेहाल जीवन गुजारने के सिवाय कोई चारा नहीं था।
कुछ दिन गाँव-जवार में धक्का खाने के बाद रमेसर बाबू सम्मानित जीवन जीने के लिए गँवई जीवन का त्याग करते हुए कोलकाता की राह पर निकल पड़े।कोलकाता में पहुँचकर इधर-उधर धक्का खाने के बाद एक दिन रमेसर बाबू की मुलाकात कतवारू साहू से हुई थी। कतवारू साहू भी पास के गाँव के ही रहने वाले थे पर बहुत पहले कोलकाता आ गए थे और अपनी मेहनत-ईमानदारी से उस समय कोलकाता में 3-4 दुकानों के मालिक बन बैठे थे। कतवारू साहू बहुत ही प्रेम से रमेसर बाबू से मिले थे और उन्हें अपनी खोली पर ले गए थे। खोली पर आवभगत के बाद रमेसर बाबू ने दुखी मन से अपनी आपबीती सुनाई थी और यह सब देख-सुनकर कतवारू साहू की आँखें छलक उठी थीं। दरअसल बहुत पहले कतवारू साहू रमेसर बाबू के बाप-दादा की मदद से ही राहखर्च लेकर कोलकाता आ पाए थे और इस बात को पूरी तरह से ससम्मान याद रखे हुए थे। कतवारू साहू ने रमेसर बाबू के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा था कि समय बड़े-बड़े घावों को भर देता है, आप निराश न हों। कुछ महीनों में ही रमेसर बाबू की तकदीर सुधरने लगी थी, हुआ यह था कि कतवारू साहू ने अपनी साख पर रमेसर बाबू को एक दुकान दिलवा दी थी और कुछ पैसे देकर उस दुकान में सामान आदि भी। अब क्या था, रमेसर बाबू दिन-रात मेहनत करके लक्ष्मी को अपनी जेब में भरने लगे थे।रमेसर बाबू को कोलकाता आए लगभग 10 साल हो गए थे। जब वे कोलकाता की राह पर निकले थे उस समय वे किशोर थे यानि 14-15 बरिस के। अब वे 25-26 में खेल रहे थे और खान-पान से चेहरा भी लाल हो उठा था। उस समय, इस उम्र में उन्हें 2 बच्चों का पिता हो जाना चाहिए था पर अब तक वे शादी से बँचते रहे थे। जब भी कतवारू साहू उन्हें शादी करने के लिए कहते तो वे कहते कि कतवारू काका, शादी तो मैं अपने जवार में ही करूँगा। खैर रमेसर बाबू की मेहनत रंग लाई थी और वे अब काफी मालदार हो गए थे।

 एकदिन वे कतवारू साहू से मिले और कहे कि काका अब मैं गाँव जाऊँगा और गाँव में खेती-बारी खरीदकर खेती करूँगा और विवाह करके अपना संसार बसाऊँगा।जी हाँ, अब रमेसर बाबू अपने गाँव आ गए थे और गाँव से बाहर ही कुछ दूरी पर लगभग 2 बीघे जमीन खरीद लिए थे। इस जमीन में वे एक छोटा पर आलीशान घर बनवाने के साथ ही मवेशियों के रहने के लिए खपड़ैल आदि से छवा दिए थे। उन्होंने दो जोड़ी अच्छे बैल, 2 दुधारू गाय और एक भैंस भी खरीद लिए थे। इसके साथ ही अच्छी नस्ल का एक घोड़ा भी उनके घर के आगे बँध गया था। अब कहें तो रमेसर बाबू की बाबूशाहत वापस आ गई थी। गाँव-जवार में उन्हें ससम्मान देखा जाने लगा था। उन्होंने पास के ही शहर में कुछ धंधा-पानी भी शुरू कर दिया था, जीवन पूरी तरह से पटरी पर दौड़ने लगा था। अब तो जवार-जिले के सभी बाबूसाहब लोग उन्हें अपना रिस्तेदार बनाने के लिए आगे आने लगे थे, जिनके घर कोई विआह योग्य लड़की नहीं थी वे लोग रमेसर बाबू से अपनी पिछली, बाप-दादों के समय की रिस्तेदारी निकालने लगे थे। देखते ही देखते जवार के ही एक धनी-मानी बाबूसाहब की लड़की दुल्हन बनकर रमेसर बाबू के घर आ गई पर यह भी सत्य है कि रमेसर बाबू और उनकी पत्नी के उम्र में 14-15 साल का अंतर था। शादी के समय रमेसर बाबू लगभग 30 के थे और उनकी पत्नी 15-16 की। खैर उस समय तो पैसे वाले मालधनी लोग बुढ़ापे में भी 12-15 की कन्या से विआह रचाया करते थे, यानि समाज में धन-धान्य का बहुत ही बोलबाला था, वैसे आज के समय में भी हर जगह धन को दखलअंदाजी करते हुए देखा जा सकता है।शादी को बीते अभी 1-2 साल भी नहीं बीते थे कि एक अति दुखदायी, मर्माहत करने वाली घटना घट गई। हुआ यूं कि एक रात रमेसर बाबू अपने घर में सोए हुए थे पर दूसरे दिन सुबह उनकी तथा उनकी पत्नी की सरकटी लाश घर में ही पड़ी मिली। सुबह-सुबह उनके नौकर-चाकर द्वारा यह बात पूरे गाँव में फैल गई। किसी को कुछ भी पता नहीं था कि रमेसर बाबू और उनकी पत्नी को किसने इतनी घिनौनी, हृदयविदारक मौत दी? आखिर इसके पीछे कारण क्या था? उस भले मानुष को किसने मारा होगा? पूरा गाँव रो रहा था, पुलिस भी आ गई थी। कानूनी कार्यों के बाद रमेसर बाबू के एक करीबी ने उन दोनों की चिता में आग दी थी। कुछ लोगों को नौकर-चाकर पर तो कुछ लोगों को उनके किसी करीबी पर शक था पर महीनों चली पुलिस कार्रवाई में कुछ भी खुलासा नहीं हुआ और लोग भी धीरे-धीरे इस घटना को भूलने लगे थे। अब इस घर पर पूरी तरह से रमेसर बाबू के इकलौते साले साहब का अधिकार हो गया था। कोई विशेष करीबी न होने के कारण गाँव वालों ने भी सुलह से वह सारी जमीन, घर आदि उनके साले के अधिकार में रहने देना ही उचित समझा। अब उस घर पर पूरी तरह से रमेसर बाबू के साले का अधिकार हो गया था। उन्होंने अपनी बहन और जीजा का दाह-संस्कार करने के साथ ही घर के बाहर उन दोनों के नाम से एक छोटी बैठक बनवाई ली थी और सुबह-सुबह उसमें बैठकर गरीबों को कुछ दान-पुण्य करके अपने नेकदिल जीजा एवं बहन की आत्मा की शांति के लिए प्रयास करते दिखते थे। धीरे-धीरे कानूनी कार्रवाई करके उन्होंने वह सारी जमीन, घर आदि भी अब अपने नाम करा लिया था।

एकदिन की बात है, भिनसहरे जब रमेसर बाबू के साले का एक नौकर मवेशियों को सानी-पानी कर रहा था, उसी समय उसे साक्षात रमेसर बाबू और उनकी पत्नी दिखीं। दोनों की आँखें गीली हो रही थीं, अभी वह नौकर कुछ कह पाता इससे पहले ही रमेसर बाबू बोल पड़े, “डरो नहीं किरिपा भाई। दरअसल मेरे साले ने ही हम दोनों को मौत के घाट उतारकर हमारी संपत्ति का मालिक बन बैठा है पर अब अधिक दिनों तक वह भी जिंदा नहीं रह सकता। हम उसे ऐसी मौत देंगे कि देखने वालों का हृदय काँप उठेगा।” इतना कहने के साथ ही रमेसर बाबू और उनकी पत्नी का भूत गायब हो गए। अब तो किरिपा नामक नौकर पसीने से पूरी तरह डूबा हुआ था। वह अब मवेशियों को नांद पर बाँदना छोड़कर गाँव की ओर भागा और गाँव के कुछ बड़े-बुजुर्गों को यह बात बताई। गाँव के कुछ लोगों ने तो उसकी बात पर विश्वास किया पर अधिकांश ने इसे उसके खुराफाती दिमाग की उपज मानी। कुछ लोगों ने कहा कि हो सकता है कि रमेसर बाबू के साले ने इसको डाँटा हो इसलिए यह ऐसी बातें कर रहा है। खैर, किरिपा की अब हिम्मत नहीं थी कि वह अपने काम पर जाए, वह तो इतना परेशान हो गया था कि उसी दिन सुबह-सुबह ही अपना गाँव छोड़कर किसी रिस्तेदारी में चला गया।खैर कुछ बातें अधिक दिन तक नहीं छिपतीं। हुआ यूं था कि रमेसर बाबू के साले अब बराबर कुछ पंडितों को बुला कर घर में अनुष्ठान करवाना शुरू कर दिए थे। पहले तो उन्होंने पंडितों को भी कुछ खुलकर नहीं बताया पर अंततः उन्हें बताना ही पड़ा कि इस घर पर भूतों का छाया है। रात को अजीब-अजीब घटनाएँ घटती हैं। कभी-कभी दिन में भी उनके साथ हृदय को कंपा देने वाली घटना घट जाती है। फिर उन्होंने अपने बचाव में एक नई अफवाह फैलाई कि कोई उनका दुश्मन उनसे इस जीजा के घर-जमीन को छिनना चाहता है, इसलिए उसने भूतों को छुड़वा रखा है। खैर अब तो पंडितों के अनुष्ठानों के साथ ही सोखाओं आदि का आना भी शुरू हो गया था। सभी लोग भूतों को अपने बस में करने की, उन्हें बाँधने की, उन्हें भगाने की कोशिश करते पर कोई सफल नहीं होता। अब तो दिन-दिन रमेसर बाबू के साले का जीवन नरकीय होता जा रहा था। वे मानसिक रूप से भी कमजोर होते जा रहे थे पर फिर भी वे इस बात को छिपाने की कोशिश करते कि उनके जीजा और बहन के भूत ही उन्हें परेशान कर रहे हैं। अब लोगों को भी दाल में कुछ काला नजर आने लगा था पर फिर भी कोई कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।एकदिन कुछ पंडितों ने कहा कि हो सकता है कि उनके जीजा एवं बहन की अतृप्त आत्माएँ ही उन्हें परेशान कर रही हों? फिर क्या था, काशी से एक बड़े पंडित बुलाए गए, उस पंडित ने कहा कि मैं आपके जीजा और बहन के लिए थान (स्थान) बाँध देता हूँ, आप नियमित रूप से उनकी पूजा करें, कोई परेशानी नहीं रहेगी। फिर क्या था, अनुष्ठान शुरू हुआ। मंत्रोच्चार शुरु हुआ।
घर के पास ही खुले में दो पिंडियाँ (एक जीजा एवं एक बहन के लिए) बाँधनी शुरू की गईं। इसी दौरान रमेसर बाबू के साले ने पैसे से भरी अपनी थैली निकाली और गरीब लोगों को अपने जीजा-बहन के नाम पर दान करना शुरू किए। अरे यह क्या कोई कुछ समझ पाए, तभी एक हाथ उनकी ओर बढ़ा और पैसे की उस थैली को छिनकर दूर फेंक दिया। इतना ही नहीं कोई आगे आए उससे पहले ही एक अदृश्य आवाज गूँजी, तूने पैसे-जमीन आदि के लिए ही न हम दोनों को मारा था, तूँ भी इस पैसे-जमीन का उपभोग नहीं कर सकता। इतना कहते ही ऐसे लगा कि रमेसर बाबू के साले का गला कोई अदृश्य शक्ति दबा रही है, किसी की भी हिम्मत नहीं हुई आगे बढ़ने की, देखते ही देखते रमेसर बाबू के साले के मुँह से रक्त फूट पड़ा, उनकी आँखें डर की विभत्सा से डर कर ऐंठ गईं। जी हाँ, उनकी इहलीला समाप्त हो गई।इस घटना को घटे काफी दिन हो गए हैं। रमेसर बाबू के गाँव-जवार के लोग आज भी कहते फिरते हैं कि व्यक्ति जो कुछ भी करता है, उसे कोई न कोई देख रहा है। अगर गलत काम के लिए कानून सजा न दे पाए तो भगवान देता ही है। आज भी वह घर विरान पड़ा हुआ है, किसी की हिम्मत नहीं होती उस घर में जाने की, साथ ही गाँववालों को कभी-कभी श्वेत वस्त्र में लिपटे रमेसर बाबू और उनकी पत्नी दिख जाते हैं।
 गाँव वाले श्रद्धा से नतमस्तक हैं क्योंकि इस घटना के बाद से उस गाँव में कोई ऐसी घटना नहीं घटी और एक बार तो इस गाँव के एक व्यक्ति पर भिनसहरे खेतों की तरफ एक जंगली सूअर ने आक्रमण कर दिया था तो उस व्यक्ति ने बताया था कि उसकी रक्षा रमेसर बाबू ने ही की थी। आज भी रमेसर बाबू का वह घर विरान पड़ा हुआ है और खंडहर में तब्दील हो गया है पर घर के बाहर बनी उन पिंडियों पर अगरबत्ती-कपूर जलता रहता है। उधर से गुजरने वाला कोई भी गाँव-जवारी उन पिंडियों के आगे नतमस्तक होना नहीं भूलता।

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Bhoot wali kahani- 3 

अच्छा भूत

 5 मिनट की bhoot wali kahani

कुफरी में स्कीइंग का लुफ्त उठाने और पूरा दिन मौज मस्ती करने के पश्चात कुमार, कामना, प्रशान्त और पायल शाम को शिमला की ओर बीएमडब्लू में जा रहे थे। सर्दियों के दिन, जनवरी का महीना, शाम के छ: बजे ही गहरी रात हो गई थी। गोल घुमावदार रास्तों में अंधकार को चीरती, पेडों के झुरमुठ के बीच कार चलती जा रही थी। सैलानी ही इस समय सडकों पर कार चलाते नजर आ रहे थे। टूरिस्ट टैक्सियां भी वापिस शिमला जा रही थी। कुफरी की ओर इक्का दुक्का कारें ही जा रही थी। बातों के बीच चारों शिमला की ओर बढ रहे थे। लगभग आधा सफर कट गया था कार स्टीरियो की तेज आवाज में हंसी ठिठोली करते हुए सफर का आनन्द उठाते हुए समय का पता नही चल रहा था। तभी कार झटके मारते हुए रूकने लगी। “अरे, क्या कर रहे हो कुमार? ठीक तरीके से कार चलाऔ। झटके मारते हुए कार क्यों चला रहे हो?” प्रशान्त ने झटकती हुई कार में झूलते हुए कुमार से पूछा। “प्रशान्त भाई, मैं तो कार ठीक चला रहा हूं, मालूम नही, यह अचानक से झटके क्यों खा रही है?” कुमार ने झटके खाती कार को संभालते हुए कहा। “कार को थोडा साईड करके देख लेते हैं। “हो सकता है, कि डीजल में कचरा आ गया हो, थोडी रेस दे कर देखता हूं, कि कार रिदम में आ जाए। “ कुमार ने क्लच दबाते हुए कार का ऐक्सीलेटर दबाया, लेकिन कोई खास कामयाबी नही मिली, कार झटके खाती हुई रूक गई। “अब क्या करे?” चारों के मुख से एक साथ निकला। सभी सोचने लगे, कि काली रात के साए में कुछ भी नजर नही आ रहा था सोने पे सुहागा तो धुन्ध ने कर दी थी। धीरे धीरे धुन्ध बढ रही थी। ठंडक भी धीमे धीमे बढ रही थी। कार सडक की एक साईड पर खडी थी। इक्का दुक्का कार, टैक्सी आ जा रही थी। “प्रशान्त बाहर निकल कर मदद मांगनी पडेगी। कार में बैठे रहने से कुछ नही होगा। कार तो हम चारों का चलाना आता है, लेकिन कार के मैकेनिक गिरी में चारों फेल है। शायद कोई कार या टैक्सी से कोई मदद मिल जाए। “ कह कर कुमार कार से बाहर निकला। एक ठंडे हवा के तेज झोके ने स्वागत किया। शरीर में झुरझरी सी फैल गई। प्रशान्त भी कार से बाहर निकला। पायल और कामना कार के अंदर बैठे रहे। ठंड बहुत अधिक थी दिल्ली निवासियों कुमार और प्रशान्त की झुरझरी निकल रही थी। दोनों की हालात दयनीय होने लगी। “थोडी देर खडे रहे तो हमारी कुल्फी बन जाएगी।“ कुमार ने प्रशान्त से कहा। “ठीक कह रहे हो, लेकिन कर भी क्या सकते है।“ प्रशान्त ने जैकेट की टोपी को ठीक करते हुए कहा। “लिफ्ट मांग कर शिमला चलते है, कार को यहीं छोडते है। सुबह शिमला से मैकेनिक ले आएगें।“ कुमार ने सलाह दी। “ठीक कहते हो।“ रात का समय था। गाडियों की आवाजाही नगण्य थी। काफी देर बाद एक कार आई। उनको कार के बारे में कुछ नही मालूम था, वैसे भी कार में पांच सवारियां थी। कोई मदद नही मिली। दो तीन कारे और आई, लेकिन सभी में पूरी सवारियां थी, कोई लिफ्ट न दे सका। एक टैक्सी रूकी। ड्राईवर ने कहा, जनाब मारूती, होंडा, टोएटा की कार होती तो देख लेता, यह तो बीएलडब्लू है, मेरे बस की बात नही है। एक काम कर सकते हो, टैक्सी में एक सीट खाली है, पति, पत्नी कुफरी से लौट कर शिमला जा रहे हैं। उनसे पूछ तो, तो एक बैठ कर शिमला तक पहुंच जाऔगे। वहां से मैकेनिक लेकर ठीक करवा सकतो हो। टैक्सी में बैठे पति, पत्नी ने इजाजत दे दी। कुमार टैक्सी में बैठ कर शिमला की ओर रवाना हुआ।
प्रशान्त कार में बैठ गया। प्रशान्त पायल और कामना बातें करते हे समय व्यतीत कर रहे थे। धुन्ध बढती जा रही थी। थोडी देर बाद प्रशान्त पेशाब करने के लिए कार से उतरा। कामना, पायल कार में बैठे बोर हो गई थी। मौसम का लुत्फ उठाने के लिए दोनों बाहर कार से उतरी। कपकपाने वाली ठंड थी। “कार में बैठो। बहुत ठंड है। कुल्फी जम जाएगी।“ प्रशान्त ने दोनों से कहा। “बस दो मिन्ट मौसम का लुत्फ लेने दो, फिर कार में बैठते हैं।“ पायल और कामना ने प्रशान्त को कहा। “भूतिया माहौल है। कार में बैठते है।“ प्रशान्त ने कहा। प्रशान्त की बात सुन कर पायल खिलखिला कर हंस दी। “भूतिया माहौल नही, मुझे तो फिल्मी माहौल लग रहा है। किसी भी फिल्म की शूटिंग के लिए परफेक्ट लोकेशन है। काली अंधेरी रात, धुन्ध के साथ सुनसान पहाडी सडक। हीरो, हीरोइन का रोमांटिक मूड, सेनसुएस सौंग। कौन सा गीत याद आ रहा है।“ “तुम दोनों गाऔ। मेरा रोमांटिक पार्टनर तो मैकेनिक लेने गया है।“ कामना ने ठंडी आह भर कर कहा। तीनों हंस पडे। तीनों अपनी बातों में मस्त थे। उनको मालूम ही नही पडा, कि कोई उन के पास आया है। एक शख्स जिसने केवल टीशर्ट, पैंट पहनी हुई थी, प्रशान्त के पास आ कर बोला “आपके पास क्या माचिस है?” इतना सुन कर तीनों चौंक गए। जहां तीनों ठंड में कांप रहे थे, वही वह शख्स केवल टीशर्ट और पैंट पहने खडा था, कोई ठंड नही लग रही थी उसे। प्रशान्त ने उसे ऊपर से नीचे तक गौर से देख कर कहा। “आपको ठंड नही लग रही क्या?” उसने प्रशान्त के इस प्रश्न का कोई उत्तर नही दिया बल्कि बात करने लगा “आप भूतिया माहौल की अभी बातें कर रहे थे। क्या आप भूतों में विश्वास करते हैं? क्या आपने कभी भूत देखा है?” “नही, दिल्ली में रहते है, न तो कभी देखा है और न कभी विश्वास किया है, भूतों पर।“ प्रशान्त ने कह कर पूछा, “क्या आप विश्वास करते है?“  “हम पहाडी आदमी है, हर पहाडी भूतों को मानता है। उन का अस्तित्व होता है।“ उस शख्स की भूतों की बाते सुन कर कामना और पायल से रहा नही गया। उनकी उत्सुक्ता बढ गई। “भाई, कुछ बताऔ, भूतों के बारे में।
फिल्मी माहौल हो रखा है, कुछ बात बताऔ।“ उस शख्स ने कहा “देखिए, हम तो मानते है। आप जैसा कह रहे हैं, कि शहरों में भूत नजर नही आते, हो सकता है, नजर नहीं आते होगें मगर पहाडों में तो हम अक्सर देखते रहते है। “कहां से आते है भूत और कैसे होते हैं, कैसे नजर आते है।“ प्रशान्त ने पूछा। उस शख्स के हाथ में सिगरेट थी, वह सिगरेट को हाथों में घुमाता हुआ बोला “भूत हमारे आपके जैसे ही होते हैं। वे रौशनी में नजर नही आते है।“ “होते कौन है भूत, कैसे बनते है?“ पायल ने पूछा। “यहां पहाडों के लोगों का मानना है, कि जो अकस्मास किसी दुर्घटना में मौत के शिकार होते है या फिर जिनका कत्ल कर दिया जाता है, वे भूत बनते है।“ उस शख्स ने कहा। “क्या वे किसो को नुकसान पहुंचाते है, मारपीट करते हैं?” प्रशान्त ने पूछा। “अच्छे भूत किसी को कुछ नुकसान पहुंचाते है। अच्छा मैं चलता हूं। सिगरेट मेरे पास है। आप के पास माचिस है, तो दीजिए, सिगरेट सुलगा लेता हूं। “ उस शख्स ने कहा। प्रशान्त ने लाईटर निकाल कर जलाया। उस शख्स ने सिगरेट सुलगाई। लाईटर की रौशनी में सिर्फ सिगरेट नजर आई वह शख्स गायब हो गया। लाईटर बंद होते ही वह शख्स नजर आया। तीनों के मुख से एक साथ निकला – भूत। तीनों, प्रशान्त, पायल और कामना का शरीर अकड गया और बेसुध होकर एक दूसरे पर गिर पडे। अकडा शरीर, खुली आंखें लगभग मृत्य देह के सामान तीनों मूर्क्षित थे। वह शख्स कुछ दूरी पर खडा सिगरेट पी रहा था। तभी वहां आर्मी का ट्रक गुजरा। उसने ट्रक को रूकने का ईशारा किया। ट्रक ड्राईवर उसे देख कर समझ गया, कि वह कौन है।
ट्रक से आर्मी के जवान उतरे और तीनों को ट्रक पर डाला और शिमला के अस्पताल में भरती कराया। कुछ देर बाद कुमार कार मैकेनिक के साथ एक टैक्सी में आया। अकेली कार को देख परेशान हो गया, कि तीनों कहां गये। वह शख्स, जो कुछ दूरी पर था, कुमार को बताया, कि ठंड में तीनों की तबीयत खराब हो गई, आर्मी के जवान उन्हें अस्पातल ले गये हैं। कह कर वह शख्स विपरीत दिशा की ओर चल दिया। मैकेनिक ने कार ठीक की और कुछ देर बाद शिमला की ओर रवाना हुए। कुमार सीधा अस्पताल गया। डाक्टर से बात की। डाक्टर ने कहा कि तीनों को सदमा लगा है। वैसे घबराने की कोई आवश्कता नही है लेकिन सदमें से उभरने में समय लगेगा। कुमार को कुछ समझ नही आया, कि उन्होनें क्या देखा, कि इतने सदमे में आ गए। अगली सुबह आर्मी ऑफिसर अस्पताल में तीनों को देखने आया। कुमार से कहा – “आई एम कर्नल अरोडा, मेरी यूनिट ने इन तीनों को अस्पातल एडमिट कराया था।“ कुमार ने पूछा – “मुझे कुछ समझ में नही आ रहा, कि अचानक से क्या हो गया?“ कर्नल अरोडा ने कुमार को रात की बात विस्तार से बताई, कि वह शख्स भूत था, जिसे देख कर तीनों सदमें में चले गए और बेसुध हो गए। वह एक अच्छा भूत था। अच्छे भूत किसी का नुकसान नही करते। उसने तीनों की मदद की। हमारे ट्रक को रोका और कुमार के वापिस आने तक भी रूका रहा। शाम तक तीनों को होश आ गया। दो दिन बाद अस्पताल से छुट्टी मिली और सभी दिल्ली वापिस गए, लेकिन सदमें से उभरने में लगभग तीन महीने लग गए। आज सात साल बीत गए उस घटना को। चारों कभी भी घूमने रात को नही निकलते। नाईट लाईफ बंद कर दी। घर से ऑफिस और ऑफिस से घर, बस यही रूटीन है उन का। उस घटना को याद करके आज भी उनका बदन ठंडा होने लगता है।

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